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स꣡मी꣢ व꣣त्सं꣢꣫ न मा꣣तृ꣡भिः꣢ सृ꣢ज꣡ता꣢ गय꣣सा꣡ध꣢नम् । दे꣣वाव्यां꣣꣬३꣱म꣡द꣢म꣣भि꣡ द्विश꣢꣯वसम् ॥११५८॥

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स्वर-रहित-मन्त्र

समी वत्सं न मातृभिः सृजता गयसाधनम् । देवाव्यां३मदमभि द्विशवसम् ॥११५८॥

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सम् । ई꣣ । वत्स꣢म् । न । मा꣣तृ꣡भिः꣢ । सृ꣣ज꣢त꣢ । ग꣣यसा꣡ध꣢नम् । ग꣣य । सा꣡ध꣢꣯नम् । देवाव्य꣣꣬म् । दे꣣व । अव्य꣣꣬म् । म꣡द꣢꣯म् । अ꣣भि꣢ । द्वि꣡श꣢꣯वसम् ॥११५८॥

सामवेद » - उत्तरार्चिकः » मन्त्र संख्या - 1158 | (कौथोम) 4 » 2 » 9 » 2 | (रानायाणीय) 8 » 5 » 1 » 2


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हिन्दी : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

आगे पुनः उसी विषय का वर्णन है।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे साथियो ! तुम (गयसाधनम्) शरीर-रूप घर के परिष्कर्ता, (देवाव्यम्) प्रकाशक मन, बुद्धि व ज्ञानेन्द्रियों के रक्षक, (मदम्) ब्रह्मानन्द का अनुभव करनेवाले, (द्विशवसम्) आत्मिक और शारीरिक दो प्रकार के बल से युक्त (ई) इस सोम नामक जीवात्मा को (मातृभिः) माताओं के समान हितकारिणी श्रद्धाओं से (अभि सं सृजत) चारों ओर से संयुक्त करो, (वत्सं न) जैसे बछड़े को (मातृभिः) गायों से संयुक्त करते हैं ॥२॥ इस मन्त्र में उपमालङ्कार है ॥२॥

भावार्थभाषाः -

विविध गुणों से विभूषित भी आत्मा में माता के समान हित करनेवाली श्रद्धा यदि नहीं है, तो वह कुछ नहीं कर सकता। गाय से संयुक्त किया हुआ बछड़ा जैसे उसका दूध पीकर पुष्ट हो जाता है, वैसे ही श्रद्धा से संयुक्त जीवात्मा ब्रह्मानन्द के पान से परिपुष्ट होता है ॥२॥

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संस्कृत : आचार्य रामनाथ वेदालंकार

अथ पुनरपि स एव विषय उच्यते।

पदार्थान्वयभाषाः -

हे सखायः ! यूयम् (गयसाधनम्) देहगृहस्य परिष्कर्तारम्। [गय इति गृहनामसु पठितम्। निघं० ३।४।] (देवाव्यम्) देवानां प्रकाशकानां मनोबुद्धिज्ञानेन्द्रियाणाम् अवितारं रक्षकम्, (मदम्) ब्रह्मानन्दमनुभवितारम् (द्विशवसम्) आत्मिकदैहिकद्विविधबलयुक्तम् (ई) ईम् एनम् सोमं जीवात्मानम् (मातृभिः) जननीभिरिव हितकरीभिः श्रद्धाभिः२ (अभि सं सृजत) अभिसंयोजयत, (वत्सं न) वत्सं यथा (मातृभिः) गोभिः अभिसंसृजन्ति तद्वत् ॥२॥ अत्रोपमालङ्कारः ॥२॥

भावार्थभाषाः -

विविधगुणगणविभूषितेऽप्यात्मनि जननीव हितकरी श्रद्धा चेन्नास्ति तर्हि सोऽकिञ्चित्कर एव। धेन्वा संसृष्टो वत्सो यथा तत्पयःपानेन पुष्टो भवति तथैव श्रद्धया संसृष्टो जीवात्मा ब्रह्मानन्दपानेन परिपुष्टो जायते ॥२॥

टिप्पणी: १. ऋ० ९।१०४।२। २. श्रद्धा चेतसः सम्प्रसादः। सा हि जननीव कल्याणी योगिनं पाति इति योग० १।२० भाष्ये व्यासः। श्रद्धा माता—साम० ९०।